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शुक्रवार, 30 दिसंबर 2016

राजनीति के बदले रंग (एक हास्य व्यंग्य कविता)

मित्रो जिस तरह से उत्तर प्रदेश में राजनीति के रंग दिन प्रतिदिन बदल रहे है,उसी को लक्ष्य करती हुई एक हास्य व्यंग्य कविता।।


शीर्षक
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राजनीति के बदले रंग
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पांच साल मिल कर रहे,
चचा भतीजे संग।।
सियासत के नये नये पैतरे,
नित बदल रहे हैं रंग।


उत्तर प्रदेश बन रहा है उत्तम,
भांति भांति के ढंग।।
चल रही समाजवादियों में,
नूरा कुश्ती और जंग।।


मोदी खड़ा बाजार में,
करके सारे नोटों को बंद।
लाइन में खड़ी है जनता,
भूखी प्यासी तंग।


आडवाणी दुखड़ा रोये,
कोसे पानी पी पीकर संग।।
पी एम के सपनों से होती
रोज रोज एक जंग।।


दीदी करती हर रोज नया,
संसद में ऐलाने जंग।।
देता आश्वासन हर कोई,
सड़क पे न होता कोई संग।।


युबराज चलते हर समय,
दबाए खटिया और पलंग।
लूट ले गयी जनता सभी,
चहु और मचा हुड़ दंग।।


युवराज कहे मम्मा से,
चंदन सा चमके हर अंग।
मम्मा अब लखनऊ जायेगे,
चढ़ साईकिल के संग।।


बुआ भतीजे में छिड़ी,
तीखी जुबानी जंग।
जनता बेचारी देखती,
गिरगिट जैसे रंग।।


जनता बेचारी पिस रही,
दो पाटों के संग।
खद्दर ओढ़े है सभी,
पर अंदर नंग धड़ंग।।


खुलते रोज पिटारे नये,
जनता है हर दम दंग।।
सांपो जैसे काटते,
बिच्छु सा मारे डंक।।


लुट गया लोकतंत्र बाजार में,
जनता को लगा करंट।।
देख ""आलोक" सहम गया अब,
राजनीति के बदले रंग।।
राजनीति के बदले रंग।।



आलोक कुमार सहायक अध्यापक।
बेसिक शिक्षा परिषद उत्तर प्रदेश।।

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