मित्रो एक विद्रूप जो वर्तमान में एक अध्यापक होने के नाते आज के सरकारी विद्यालयों में देखा है उसी पर एक सत्य व्यंग्य रूपी एक लघु कथा लिख रहा हूँ।पात्र जरूर काल्पनिक है पर कथा पूर्णतः सत्य जिसे हम अध्यापको ने कही न कही एहसास जरूर किया होगा।
आधुनिक कर्मयोगी शिक्षक- एक लघु कथा
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मिश्रा जी आज बड़े तन्मयता से कक्षा में बच्चों को धुआंधार पीट रहे थे आज उनके कार्यों से विद्यालय बहुत ही गुलजार था आखिर एक माह के अनधिकृत अवकाश के बाद मिश्रा जी विद्यालय में जो लौटे थे। बड़े ही संतुष्ट थे मिश्रा जी आखिर उनका 20 लाख का आलू बिना किसी परेशानी के कोल्ड स्टोर में जो पहुंच गया था।इस वजह से बेचारे विद्यालय से एक माह से बिना किसी सूचना के गायब थे।
मिश्रा जी पढ़ाते पढ़ाते चीख रहे थे," जितना भी पढ़ाओ नतीजा सिफर का सिफर ही रहता है पढ़ाई में बिल्कुल भी मन नहीं लगता है तुम सभी का।" अरे ओ सोनू कितने दिन से गायब था? 5 दिन से ज्यादा अनुपस्थित रहा तो तेरा नाम काट दूंगा ,फिर तेरा बाप गिड़गिड़ायेगा और कहेगा मास्साब दुबारा नाम लिख लो ।"
तभी वर्मा जी अचानक कक्षा के पास से गुजरते हुए बोले ,""अरे मिश्रा जी क्यों नाराज हो रहे हो ,छोड़ो भी ना उसे ।"
मिश्रा जी बोले सही बात है वर्मा जी ,""इन के नसीब में पढ़ना लिखना ही नहीं है। इनके पिछले जन्मों के बुरे कर्मों की वजह से इन्हें ईश्वर ने बुद्धि नहीं दी है इसलिए पढ़ाई कहां से करे। गीता में भी यही लिखा है ।मैं तो बहुत मेहनत से पढ़ाता हूं और बहुत ही मेहनत करता हूँ ।बिलकुल भी छुट्टी नही करता हूँ।इन्हें देखो बिना सूचना के पांच पांच दिन गायब रहते है।अब की बार तो प्रिंसिपल साहब को भी बोल दिया है ज्यादा अनुपस्थिति वर्दाश्त नही होगी मुझसे।
वैसे ये भी सही है अगर सभी पढ़ लिख ही गये तो खेतों में आलू खुदाई कौन करेगा।प्रभु का न्याय बड़ा ही सच्चा है।"
अरे छोडो वर्मा जी इस बार तो 20 लाख के आलू हुए है बडे आराम से कोल्ड तक पहुच गये।एक महीना बहुत ही बिजी रहा हूँ, कुछ देर स्टाफ रूम में जाकर आराम ही कर लूं।
ऐसा कहकर मिश्रा जी चले गए।।
वर्मा जी अवाक रहकर मिश्रा जी की मेहनत और उनके गीता के ज्ञान को समझने की कोशिश कर रहे थे।।
आलोक कुमार सहायक अध्यापक
बेसिक शिक्षा परिषद उत्तर प्रदेश

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