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रविवार, 18 दिसंबर 2016

भाड़ पर बैठकर भुनता बचपन।।

कितनी निष्ठुर है ये दुनिया समझ नही आता है कभी कभी ।
क्या मै एक अध्यापक के रूप में खुद के साथ न्याय कर पा रहा हूँ खुद ही नही समझ पा रहा हूँ।खुद ही दिग्भ्रमित हो चुका हूँ इस जमाने के दस्तूर से ।
आखिर एक अध्यापक एक गुरु की क्या पहचान है क्या है उसके मूल में।।

आज सड़क पर भाड़ पर मूंगफली बीनने वाले एक प्रवासी परिवार को देखा ।किस तन्मयता से एक 8 साल का बच्चा जिस तरह कुशलता से भाड़ में मूंगफली को भून रहा था उसके हाथों की रफ़्तार को देखकर लग रहा था कि शायद इसके हाथों में अगर कलम होती तो शायद इसके सपनो की भी यही रफ़्तार होती।।
एकटक बस कुछ पल उसे घूरता रहा है न जाने मेरे मन मष्तिष्क में क्या क्या चल रहा था।तभी अचानक उसकी एक आवाज ने तन्द्रा तोड़ी ।बाबूजी कितनी लोगे मूंगफली।कुछ देर तक मुख से कोई शब्द ही नही निकल पाए।फिर बिना कुछ लिए ही वहाँ से चल दिया,बहुत दूर तक उसकी आवाज पीछा करती रही बाबूजी लेलो कुछ सही रेट लगा लूँगा।।

न जाने क्यों इतने तेज कदमो से मै भाग कर आया था क्या पीछा कर रहा था मेरा ।उसकी आवाज या मेरी अंतरात्मा ।बहुत देर तक सोचता रहा क्या होगा इस देश का ।क्या इसी तरह भाड़ पर भुनता रहेगा इस देश का सुकुमार बचपन।।
इसी प्रण के साथ कल अवश्य मिलूँगा उस परिवार से ।कोशिश करुगा उन्हें भी शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने की।

इसी प्रण के साथ कुछ जो भी कुछ मन से निकला बस उसे कलम से लिख दिया है



मेरी कलम से
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भाड़ में बो न जाने क्या बो चुन रहा था
मूंफली की चटकन को बस यूँ सुन रहा था,
न जाने कौन से सपने बो यूँ ही बुन रहा था,
भाड़ पर बैठा बो यूँ ही भुन रहा था।।

तैर रहा था खालीपन आँखों में उसके,
शोर में भी बो सब सुन रहा था,
बेरंग दुनिया के रंगों में बो फिर भी,
न जाने कौन सा रंग बो चुन रहा था।।

न जाने कौन से सपने बो यूँ ही बुन रहा था,
भाड़ पर बैठा बो यूँ ही भुन रहा था।।

देख रहा था गोदी में जाते बचपनो को,
किलकारियों को एकटक बो सुन रहा था।
भर जाती थी उसकी यूँ अंखिया बार बार,
मन ही मन में  हरपल बो यूँ कुढ़ रहा था।।

न जाने कौन से सपने बो यूँ ही बुन रहा था,
भाड़ पर बैठा वो यूँ ही भुन रहा था।।


पाल रहा था न जाने कितने बचपनो को,
दिल ही दिल में जाने क्या बो गुन रहा था।
रुक रहा था हर पल बो चलके न जाने क्यों,
रेत सा हरदम हवा में उड़ रहा था।।

न जाने कौन से सपने बो यूँ ही बुन रहा था,
भाड़ पर बैठा वो यूँ ही भुन रहा था ।


सर्द मौसम में भी खुद को गर्म रख रहा था,
चिथड़े चिथड़े में भी यूँ ही छुप रहा था,
देख रहा था बो एकटक गुड्डे गुड़ियों को बो,
अनजाने भय से मन ही मन बो घुल रहा था।।

न जाने कौन से सपने बो यूँ ही बुन रहा था,
भाड़ पर बैठा बो यूँ ही भुन रहा था।।

न जाने क्या उसकी अँखियों में चल रहा था,
न जाने कौन से सपने चुन रहा था।
गिरता था फिर उठता फिर चल पड़ता था,
बिना तलवार ढाल के बो हरपल,
खुद ही खुद से लड़ रहा था।
खुद ही खुद से लड़ रहा था।
खुद ही खुद से लड़ रहा था।


आलोक कुमार सहायक अध्यापक
बेसिक शिक्षा परिषद।
उत्तर प्रदेश

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