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शुक्रवार, 23 दिसंबर 2016

एक गुड़िया-अंतर्मन की व्यथा


 मेरी कक्षा 1 की गुड़िया ।

7 साल की उम्र और नाम गुड़िया।।

कितना प्यारा नाम है न ।उसके माँ बाप ने भी यही सोच कर रखा था।बो सच मे है भी गुड़िया सी।गोल मटोल ,गोल गोल उभरी हुई आँखे,गालों पर हसने पर पड़ते हुए गड्ढ़े।छोटे छोटे बाल,गोरा भरा हुआ चेहरा।

तेज दिमाग खुद में ही खोए रहने का एक अजीव सा हुनर।सब कुछ है उसके चेहरे पर बस गायब है एक चमक ,एक शरारतपन।चेहरा बहुत छोटा लेकिन हाव भाव न जाने कितने बड़ो के।

किसी भी काम में कोई हड़बड़ी नही न मिड डे मील लेते समय न कॉपी चेक करवाते समय।

एक अजीव सा धैर्य है उसमें।क्लास में सबसे पीछे बैठना चुपचाप अपना काम करना।न कोई बाल हठ न कोई शरारत न कोई जिज्ञासा।मानो ऐसा लगता है जैसे दुनिया को हमसे भी ज्यादा जानती है।

एक अजीव सी निगाहों से देखना,न जाने क्या अंतहीन ढूढना।पढ़ने में भी एक अजीव सी स्थिरता धीरे धीरे लेकिन स्थायी रूप से याद रखना।।

लंच के समय दरवाजे की कुण्डी पकड़ कर खड़े हो जाना,एक अजीब सी निगाहों से और बच्चों को खाना खाते देखना।लंच लेकर लाने पर भी लंच न करना।

किसी भी बच्चे के साथ कोई भी खेल न खेलना,चुपचाप खंभे के पीछे से और बच्चों को खेलते हुए देखना,और खेल देख कर मन ही मन में कुछ बुदबुदाना ,खुद से बाते ही करते रहना।।

डॉटने पर चुपचाप एक या आधी रोटी को खा लेना।फिर चुपचाप लंच ख़त्म होने पर न कुछ खेलना न कुछ कूदना।

फिर अकेले क्लास में आकर फिर से किताबो के चित्रों में फिर खो जाना।पन्ने पलटना फिर चित्रों पर उंगलियां फिराना, मन ही मन में कुछ बुदबुदाना।

दीवारों पर एक टक निगाह बांध लेना।कभी डंडा उठाकर खुद ही लगे चार्टों को पढ़ना।न जाने तमाम तरह के उपक्रम करना।।

धीरे धीरे बड़े सोच विचार के बोलना, बोर्ड पर पढ़ने में जोर जोर से झल्ला झल्ला कर पढ़ना।बस जल्दबाजी से पढ़ कर अपनी जगह पहुच जाना।फिर खुद से खुद में ही व्यस्त हो जाना।।

किसी अज्ञात भय या किसी अपने से मन ही मन लड़ना।कभी अचानक सिहर जाना कभी बिना वजह अचानक ही मुस्कुरा कर औरो को मुस्कुराने की वजह दे देना।।

असल में गुड़िया नाम को चरितार्थ कर रही है ,पर क्या है इस उदासी की वजह ,क्यों है गुमसुम ये गुड़िया खुद नही समझ पा रहा हूँ।क्या बुदबुदाती है मन ही मन में बो नही सुन पा रहा हूँ।


अभी उससे दोस्ती करने के दौर में चल रहा हूँ।उसके नजदीक पहुचने की कोशिश कर रहा हूँ, ताकि और बहुत कुछ समझ सकूँ।

हां कुछ समझ तो रहा हूँ उदासी की वजह पर अभी भी बहुत कुछ समझना है बहुत कुछ जानना है।।

आखिर उस ऊपर वाले ने एक बहुत बड़ा दर्जा दे रखा है एक  शिक्षक का ।।

आगे का अवश्य लिखूंगा.....


आलोक कुमार सहायक अध्यापक
बेसिक शिक्षा परिषद उत्तर प्रदेश

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