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गुरुवार, 5 जनवरी 2017

निर्भीकता -- एक लघु कथा ( मेरी कलम से)

मित्रो आज के समय में जिस तरह से कलम चल रही है कलम अपने मूल चरित्र निष्पक्षता और निर्भीकता को छोड़कर जिस तरह का लेखन कर रही है उसी के परिप्रेक्ष्य में ये एक लघु कथा है।।



निर्भीकता (एक लघु कथा)
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"""मैने हमेशा सच का साथ दिया है।मेरी आवाज कभी भी खामोश नही की जा सकती है।चाहे कोई भी सरकार रही हो चाहे बो केंद्र की या राज्य की मैने हमेशा गलत नीतियों का विरोध किया ।मुझे किसी भी सम्मान की आकांक्षा नही है मेरा सबसे बड़ा सम्मान मेरे पाठक है।
मेरी कलम कभी भी चाटुकारिता में नही चली है।मैने बिना लाग लपेट के नंगा सच लिखा है ,नँगा सच।।
मेरी आवाज को खामोश करने के लिए न कितने हथकंडे अपनाए गये है ,लेकिन मै कभी भी डरा नही हूँ।
मैने हमेशा निर्भीकता से ,हां,हमेशा निर्भीकता से सच लिखा है और लिखता रहूँगा।""""
रामनरेश मिश्र जी की बातों को सुन कर
दस हजार से भी ज्यादा लोगो की तालियों से पूरा हॉल गूंज उठता है।।
आज मिश्र को 23 वे साहित्य सम्मान रत्न से नवाजा जो जा रहा था।।
आज बड़े ही प्रश्न मुद्रा में घर लौटे थे घर पर मिश्र जी।
मिश्र जी की धर्मपत्नी बोली ,""अरे आप को इतने वर्ष हो गए लिखते लिखते ,कभी नक्सलियों पर कुछ क्यों नही लिखते है ,कितना आतंक सा मचा रखा है इन लोगो ने। देखते नही न जाने कितने लोगो को मौत के घाट उतार चुके है।आतंक का पर्याय बन चुके है ये लोग।"""
मिश्र जी बोले, "" अरे भाग्यवान ,सरकारों के विरोध में लिखना आसान है पाठक भी मिलते है और इनाम भी।।
अगर किसी नक्सली के खिलाफ लिख दिया और उन्हें बुरा लग गया तो,क्या पता कोई कल को कोई नक्सली सीधा  ऊपर ही पंहुचा दे।अरे तुम नही समझोगी इन सब बातों को।"""
इतना कहकर मिश्र जी टीवी पर चल रहे अपने सम्मान समारोह के दृश्य देखने लगे और उनकी धर्म पत्नी अपने निर्भीक पति के चेहरे के हाव भाव को।।।



आलोक कुमार सहायक अध्यापक
बेसिक शिक्षा परिषद।।

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