"" कब तक कोख में मारोगें बेटियां"""
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मित्रो विद्यालयं में कुछ ऐसा देखा जिससे खुद को रोक नही सका इसको लिखने से।।एक 7 साल की लड़की जिस तरह से अपने 4 साल के भाई को खिला रही थी,बार बार डाटना, अपनी चम्मच से उसे पकड़ कर धीरे धीरे खिलाना,भाई का बार बार खाना गिराना, हल्के से उसे डाटना ।फिर भाई को मनाना ,फिर उसे खिलाना ,फिर उसे बीच बीच में कुछ सुनाना, उसे अपनी नजरो से दुनिया दिखाना,देख भैया देख भैया कहकर उसे बो सब अपनी नजरो से दिखाना जो शायद बो अभी देखने या समझने के लायक नही है।कितनी ईमानदार कोशिश कर रही थी एक बहन अपने भाई के लिए।।
समझ नही पा रहा था कि बो 7 साल की है या 70 साल की।भाई के लिए एक परिपक्व व्यवहार,सुलझा हुआ दिमाग,और हां सबसे खास भाई के लिए एक उसकी कभी न टूटने वाली ढाल।।और उसका एक विश्वास कि बो अपने भाई के लिए सब कुछ है और उसका सब कुछ उसके भाई का है।।
उस 7 साल की एक लड़की में एक माँ को देखा, एक परिपक्व बहन को देखा,और न जाने क्या क्या देख रहा था।।
समझ नही पा रहा था कि बो 7 साल की है या 70 साल की।भाई के लिए एक परिपक्व व्यवहार,सुलझा हुआ दिमाग,और हां सबसे खास भाई के लिए एक उसकी कभी न टूटने वाली ढाल।।और उसका एक विश्वास कि बो अपने भाई के लिए सब कुछ है और उसका सब कुछ उसके भाई का है।।
उस 7 साल की एक लड़की में एक माँ को देखा, एक परिपक्व बहन को देखा,और न जाने क्या क्या देख रहा था।।
अचानक उस लड़की का स्वर कानो में गूंजता है," सर जी भैया रो रहा है उसके लिए बाहर वाली दुकान से टॉफी ले आऊ।" मेरी मौन सहमति के बाद बो अपनी डिब्बी में से कुछ ढूढने लग जाती है।अचानक मेरीआँखे नम हो जाती है कुछ देखकर।अरे अरे ये तो वही रुपया था जिसे सुबह उसने अपने पापा से ,जब बो स्कूल आयी थी तब अपनी चीज खाने के लिए जबरदस्ती माँगा था।उस सिक्के से अपने रो रहे भैया को अपनी छोटी सी नाजुक कमर पर गोदी लेकर बाहर वाली दुकान से टॉफी लेने चली जाती है।और मै उसके कदमो के निशानों को देख कर सोचने लगता हूँ कि ये कदमो के निशान हम जैसे बड़ो लोगो को आइना दिखाने के लिए पर्याप्त है कि नही।।
शायद पर्याप्त ही नही बहुत ज्यादा है पर उन क़दमों के निशान को देखे कौन और देखे भी समझने की जहमत कौन उठाये।।
बस इससे आगे लिखने की मेरी कलम में सामर्थ्य नही थी। उसी भाव को अपनी कुछ पंक्तियों में लिखने का एक असफल प्रयास किया है।।
शीर्षक
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""कोख में कब तक मारोगें बेटियाँ""
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कब तक किश्ते भरेंगी बेटियाँ
कब तक खुद से लड़ेगी बेटियां।
यूँ तो बंधी है हर बंधन में बो,
कब नभ में उड़ेंगी ये बेटियां।।
कब तक खुद से लड़ेगी बेटियां।
यूँ तो बंधी है हर बंधन में बो,
कब नभ में उड़ेंगी ये बेटियां।।
क्यों कुम्हला रही है बो हर पल,
डाल से क्यों टूट रही है बेटियां।
कब आएगा बसंत इस बगिया में,
क्यों रेत सी सूख रही है बेटियाँ।।
डाल से क्यों टूट रही है बेटियां।
कब आएगा बसंत इस बगिया में,
क्यों रेत सी सूख रही है बेटियाँ।।
क्यों है बेसहारा बो आज कल,
क्या किसी से कम है बेटियां।
क्यों दे रहा जमाना दर्द उनको,
हँस के भी क्यों रो रही है बेटियां।
क्या किसी से कम है बेटियां।
क्यों दे रहा जमाना दर्द उनको,
हँस के भी क्यों रो रही है बेटियां।
है माँ की झुर्रियों में बो हर पल,
भाई की राखीें है बेटियां।
आंच जो आये कभी किसी पर,
सत्यवान की सावित्री है बेटियाँ।
भाई की राखीें है बेटियां।
आंच जो आये कभी किसी पर,
सत्यवान की सावित्री है बेटियाँ।
है उसमें सूरत एक माँ की,
भाई की अदृश्य ढाल है बेटियाँ।।
छोड़ कर के बाबुल का घर अँगना,
पराये आँगन में भी खिलती है बेटियां।
भाई की अदृश्य ढाल है बेटियाँ।।
छोड़ कर के बाबुल का घर अँगना,
पराये आँगन में भी खिलती है बेटियां।
इंद्रधनुष सा सतरंगी आँचल है उसका,
फूलों में गुलाब सी महकती है बेटियाँ
बिन उसके त्यौहार फीके फीके से है सब,
होली सी रंगीन, दिवाली सी रोशन है बेटियां।
फूलों में गुलाब सी महकती है बेटियाँ
बिन उसके त्यौहार फीके फीके से है सब,
होली सी रंगीन, दिवाली सी रोशन है बेटियां।
है बो सावन की फुहारों सी शीतल,
जल बिन मछली सी है बेटियां।
खुद रह ले बो चाहे बो खुद गुमसुम सी,
अधरों पे सजा देती है मुस्कान बेटियाँ।।
जल बिन मछली सी है बेटियां।
खुद रह ले बो चाहे बो खुद गुमसुम सी,
अधरों पे सजा देती है मुस्कान बेटियाँ।।
है महक उनमे सौंफ सी सौंधी,
रसोई की आवाज है बेटियाँ।
खुद रह ले चाहे भूखी अगर,
रोटी पर लगे घी सी है बेटिया।
रसोई की आवाज है बेटियाँ।
खुद रह ले चाहे भूखी अगर,
रोटी पर लगे घी सी है बेटिया।
यूँ तो मकाँ बनाते है न जाने कितने सभी,
मकाँ को घर सा बनाती है बेटियाँ।।
फुदकती रहती है इस कौने से उस कौने तक,
जमीन को जन्नत सा हसीं बनाती है बेटियां।
मकाँ को घर सा बनाती है बेटियाँ।।
फुदकती रहती है इस कौने से उस कौने तक,
जमीन को जन्नत सा हसीं बनाती है बेटियां।
नही भूलती बो कभी किसी को भी,
"मेरे भैया का भी" कहकर माँगती है बेटियाँ।
झौंक देती है खुद को हर हवन में,
रिश्तो की हर किश्तो को भरती है बेटियाँ।
"मेरे भैया का भी" कहकर माँगती है बेटियाँ।
झौंक देती है खुद को हर हवन में,
रिश्तो की हर किश्तो को भरती है बेटियाँ।
न जाने कितनी अनमोल है बो,
आखिर कब तक बिकेगी बेटियाँ।
बेटी नही तो ये जग भी नही होगा,
दहेज की सूली पर कब तक चढ़ेगी बेटियाँ।
आखिर कब तक बिकेगी बेटियाँ।
बेटी नही तो ये जग भी नही होगा,
दहेज की सूली पर कब तक चढ़ेगी बेटियाँ।
सुन लो ध्यान से बेटे की चाहत रखने वालों,
तुम्हारे कांटे भी चुनेगी यही बेटियाँ,
अल्लाह का नूर है ये खुद जमीं पर,
कब तक यूँ कोख में मारोगे बेटियां।
तुम्हारे कांटे भी चुनेगी यही बेटियाँ,
अल्लाह का नूर है ये खुद जमीं पर,
कब तक यूँ कोख में मारोगे बेटियां।

आलोक कुमार सहायक अध्यापक।
बेसिक शिक्षा परिषद उत्तर प्रदेश
बेसिक शिक्षा परिषद उत्तर प्रदेश

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