उत्तर प्रदेश की राजनीति जिस तरह से वर्तमान विधानसभा चुनाव में गधामय हो गयी है उसी पर एक व्यंग्य रचना।
कभी नोटों की चोट से,
कभी नीयतों की खोट से,
हमेशा हू मै बेभाव पिटा,
लोकतंत्र के धोबी घाट में,
मै हूं एक बेशर्म गधा।।
कभी नीयतों की खोट से,
हमेशा हू मै बेभाव पिटा,
लोकतंत्र के धोबी घाट में,
मै हूं एक बेशर्म गधा।।
कभी जाति के वोट से,
कभी धर्म की ओट से,
हमेशा गया हूँ मै छला,
लोकतंत्र के ठाट में,
मै हूँ एक बेशर्म गधा।।
कभी धर्म की ओट से,
हमेशा गया हूँ मै छला,
लोकतंत्र के ठाट में,
मै हूँ एक बेशर्म गधा।।
कभी बैंकों की लाइन में,
कभी नेता की फरमाइश में,
हमेशा रहा हूँ मै खड़ा,
लोकतंत्र के मंदिर में,
मै हूं एक बेशर्म गधा।।
कभी नेता की फरमाइश में,
हमेशा रहा हूँ मै खड़ा,
लोकतंत्र के मंदिर में,
मै हूं एक बेशर्म गधा।।
कभी परिवारो की रार में,
कभी चमचमाते पार्क मे,
हाथ जोड़े रहा हमेशा खड़ा,
लोकतंत्र के रेले में,
मै हूं एक बेशर्म गधा।।
कभी चमचमाते पार्क मे,
हाथ जोड़े रहा हमेशा खड़ा,
लोकतंत्र के रेले में,
मै हूं एक बेशर्म गधा।।
कभी भाषणों के शोर में,
उड़ती पतंगों की डोर में,
हमेशा रहा हूँ मै फसा
लोकतंत्र के मेले में,
मै हूँ एक बेशर्म गधा।
उड़ती पतंगों की डोर में,
हमेशा रहा हूँ मै फसा
लोकतंत्र के मेले में,
मै हूँ एक बेशर्म गधा।
कभी ट्रेनों की भीड़ में,
खाली पेट की पीर में,
हमेशा हूं मै पिसा,
लोकतंत्र के अनाथालय में,
मै हूं एक बेशर्म गधा।।
खाली पेट की पीर में,
हमेशा हूं मै पिसा,
लोकतंत्र के अनाथालय में,
मै हूं एक बेशर्म गधा।।
कभी दारू की ओट में,
कभी गुंडई की चोट में,
हमेशा कोड़ियों में हूँ मै बिका,
लोकतंत्र की खैरात में,
मै हूं एक बेशर्म गधा।
कभी गुंडई की चोट में,
हमेशा कोड़ियों में हूँ मै बिका,
लोकतंत्र की खैरात में,
मै हूं एक बेशर्म गधा।
लुटवाया है मैने सब कुछ सदा,
भेड़ियों के साथ हूं मै हमेशा खड़ा,
नुचवाया है खुद का गोश्त मैने,
लोकतंत्र के कट्टीघर मे,
अकेला मै ही हु एक बेशर्म गधा।
अकेला मै ही हु एक बेशर्म गधा।
भेड़ियों के साथ हूं मै हमेशा खड़ा,
नुचवाया है खुद का गोश्त मैने,
लोकतंत्र के कट्टीघर मे,
अकेला मै ही हु एक बेशर्म गधा।
अकेला मै ही हु एक बेशर्म गधा।
आलोक कुमार सहायक अध्यापक।
बेसिक शिक्षा परिषद।।
बेसिक शिक्षा परिषद।।

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